प्रश्न. रोमन कैथोलिक मिशन के कारणों का वर्णन करे |
अथवा “झारखण्ड में शिक्षा के विकास में ईसाई मिशनरियो के योगदान का वर्णन करें |
उत्तर- परिचय :- झारखण्ड में रोमन कैथोलिक मिशन की स्थापना फ़ादर स्टॉकमन ने १८६९में चाईबासा में किया | मगर झारखण्ड में इसका वास्तविक संस्थापक फ़ादर कांस्टेंट लिवेंस को माना जाता है | फ़ादर कांस्टेंट लिवेंस को “लिबिन साहब” के नाम से जाना जाता है | १८८५ में फ़ादर कांस्टेंट लिवेंस ने इस मिशन की तरफ से अपनी कार्यकलाप शुरु किए | बाद में इस मिशन का मुख्यालय चाईबासा से पुरुलिया रोड (रांची) में स्थानांतरण किया गया | फ़ादर लिवेंस ने आदिवासियों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने की उम्मीद से ज्यादा सफलतापाई| १८९३ से रोमन केथोलिक मिशन को फ़ादर जॉन हॉफमैन की सेवा प्राप्त हुई | इसने खूंटी के सरवदा को अपना कार्यछेत्र बनाया | रोमन कैथोलिक मिशन ने १९०५ में रांची में संत जॉन स्कूल खोला | इसी मिशन ने १९४४ में संत ज़ेवियर अन्तर कॉलेज की स्थापना रांची में की जो १९४८ में डिग्री कॉलेज बना |
झारखण्ड में रोमन कैथोलिक मिशन द्वारा किये गये कार्य:
१८९२ ईस्वी में फादर जे.बी. हॉफमैन ने खपरैल उध्योग सम्बंधित एक विद्यालय प्रारम्भ की, इस विद्यालय में उत्पादित कपड़े इतने किस्म के होते थे कि रोमन मिशन खपरैल के रूप में यह प्रसिध्द हो गया |परन्तु प्रथम विश्व युद्ध के प्रारम्भ होते ही यह विद्यालय बंद हो चुकी थी |
शिक्षा के विकास में ईसाई मिशनरियो के योगदान:-
नवम्बर १८८५ को रोमन कैथोलिक मिशन का फ़ादर कांस्टेंट लिवेंस नामक एक धर्म प्रचारक छोटा नागपुर आया जिसकी नीति छोटानागपुर से निरक्षरता (ज्ञान का अभाव) दूर करना था | १८८६ ईस्वी तक इस मिशन द्वारा ३० विद्यालय चलाये जा रहे थे, जिसकी संख्या बढ़ाकर १८८८ तक ७७ हो गई | जिनमे २४०० बच्चो को एडमिशन लिया गया था,२५ मार्च १८८७ईको सेंट जॉन विद्यालय की आधारशिला रखी गयी थी | इसके पहले फ़ादर स्टिकमैन बुरुडीह में एक बालिका विद्यालय की स्थापना कर चुके थे | बेल्जियम से चार लारेटो बहनों का एक दल २१ मार्च १८९० ईस्वी को रांची पहोचा जिसने १ वर्ष के अंदर एक बालिका विद्यालय की स्थापना की |
फ़ादर जॉन बैप्टिस्ट छोटानागपुर में कैथोलिक धर्म का प्रचार करने के उदेश्य से आए थे:
- १८९३ में फ़ादर जॉन बैप्टिस्ट हॉफमैन छोटानागपुर में आदिवासियों के बीच कैथोलिक धर्म का प्रचार करने के उद्देश्य से आए थे | सबसे पहले उन्होंने बनगांव अपना धर्म प्रचार का केंद्र चुना, परन्तु कुछ वर्सो के बाद उन्होंने रांची को अपना मुख्यालय बनाया जहां वे १९१५ ईस्वी तक रहे | १८९५ ईस्वी में ही उन्होंने पुरे छोटानागपुर के लिय एक केंद्रीय मध्य विद्यालय रांची में शुरु की | शुरु में यह एक रोमन कैथोलिक मध्य विद्यालय था, लेकिन १८९६ ईस्वी में गैर ईसाई लड़को को भी छात्रावास के रूप में नामाकंन दिया जाने लगा | १९०५ ईस्वी में इस विद्यालय को उच्च विद्यालय में परिवर्तित कर दिया गया, जिसे १९८० में कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बंधित कर दिया गया |
- इसके छात्रावास में रहने वालो छात्रों को ज्यदा फ़ी नहीं देना पड़ता था, रोमन कैथोलिक मिशन ने एक योजना बनाई जिसके अंतर्गत प्रत्येक मिशन स्टेशन में एक उच्च विद्यालय तथा एक मध्य विद्यालय खोलने का निर्माण लिया गया | १९१२ ईस्वी के अंत तक बालको के लिय १४० विद्यालय कैथोलिक मिशन द्वारा चलाये जा रहे थे, जिसमे करीब ७६८३ विद्यार्थीयों का नामांकन किया गया था,१९१४ ईस्वी तक रोमन कैथोलिक मिशन दूवारा एक उच्च विद्यालय लडको के लिय, चार मध्य विद्यालय लड़कियों के लिय तथा अनेक ग्रामीण विद्यालय चलाना शुरु किय जा चुके थे |
- १९०३ ईस्वी में फ़ादर ग्रोस जॉन से सेंट जॉन मध्य विद्यालय के निकट ९ विद्यार्थीयों के साथ एक ऐपटोलिक विद्यालय प्राम्भ किया गया | १९१६ ईस्वी में यहाँ विद्यार्थीयों की संख्या बढ़कर २७ हो गई थी, यहाँ ईसाई मुंडा तथा उरांव लड़को के लिए तर्कशास्त्र, गणित, इतिहास, भूगोल, भाषण, संगीत, और व्यायाम के ६ वर्षीय पाठक्रम का प्रावधान शुरु किया गया |
लेंस विद्यालय प्रारम्भ करना:-
१९०५ई० में कैथोलिक मिशन ने रांची में एक लेंस विद्यालय प्रारंभ किया, जिसमे १०० से अधिक महिलय जाने लगी तथा फीता बनाने की कला सिखाने लगी स्थानीय मुंडा तथा उरांव महिलाओ द्वारा बनाय गये फीतों को कोलकाता तथा इंग्लैंड के बाज़ारों में काफी डिमांड होने लगी थी |
दूसरा रोमन कैथोलिक उच्च विद्यालय:-
- सिंधी काका सेंट मेरी विद्यालय दूसरा विद्यालय था, जो १९२० ईस्वी में उच्च विद्यालय में परिवर्तित कर दिया गया | १९३६ ईस्वी में सेंट एग्सअस ने गुमला में उच्च विद्यालय की आधारशिला रखी |
- १९३० ईस्वी के अंत तक्रोमन कैथोलिक मिशन द्वारा संचालित ५ उच्च विद्यालय थे, जिनमे करीब १०७८ छात्र थे और ३ बालिका विद्यालय थे जिसके अंतर्गत ८६८ छात्राए अध्यन कर रही थी | इन सभी विद्यालय में उरांव जनजाति की संख्या सबसे अधिक थी और उन्हें ही शिक्षा के छेत्र में अपेक्छाकृत ज्यदा उप्ल्ब्दियाँ प्राप्त हो रही थी |
- १९२८ से १९४७ तक अनेक प्राथमिक विद्यालय को मध्य विद्यालय में परिवर्तित किया जा चुका था, कुल विद्यालयों की संख्या ६९७ थी | जिसमे लगभग १२००७ लड़के तथा ३८८४ लड़कियां पढ़ा करते थे, इन सभी विद्यालय की व्यवस्था करने में रोमन कैथोलिक मिशन को समस्या हो रही थी | जब द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ तो अनेक विद्यालयों का वीनस हो गया, १९४० ईस्वी तक कुल विद्यालय की संख्या घटकर ६०० हो गई थी |
- ७ जुलाई १९४४ को १३० विद्यालय के साथ सेंट ज़ेवियर कॉलेज रांची की स्थापना की गई, जिसमे इंटरमीडिएट की पढाई शुरु की गई | यहाँ कला तथा विज्ञान की कछा शाम में ली जा रही थी | १९४८ इस कॉलेज में स्नातक स्तर की पढाई शुरु कर दी थी, धीरे-धीरे हिंदी, अंग्रेजी , गणित, विज्ञान में प्रतिष्टा स्तर की पढाई शुरु कर दी गई, तथा छात्रों के बीच अनुशासन के कारण इससे राज्य विश्व विद्यालय का सबसे अच कॉलेज माना जाने लगा, तथा इसकी गणना बिहार के सबसे आचे कॉलेजों में की जाने लगी थी , १९७० में यह लगभग २५०० विद्यार्थी इस कॉलेज में अध्धयन कर रहे थे |
