संप्रभुता के बहुलवादी सिद्धांत

परिचय :- 

संप्रभुता के बहुलवादी सिद्धांत को संप्रभुता का आधुनिक सिद्धांत, द्वैतवादी सिद्धांत, बहुसमुदायवादी सिद्धांत आदि के नामों से जाना जाता है| इस सिद्धांत का कहना है कि मनुष्य की अनेक आवश्यकताएँ है अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति मनुष्य विभिन्न समुदायों के माध्यम से करता है क्योंकि प्रत्येक समुदाय की अपनी इच्छाएं और अपना निजी व्यक्तित्व होता है वह अपने-अपने मामले में स्वतंत्र होता है इसलिए बहुत वादियों का कहना है कि “संप्रभुता का निवास विभिन्न समुदायों में होता है|” 

संप्रभुता के बहुलवादी सिद्धांत


 बहुलवादी की प्रमुख मान्यताएं यह सिद्धांत 


  • राज्य समाज के विभिन्न समुदायों की भांति एक समुदाय मात्र है। 
  • राज्य और समाज में अंतर है। 
  • राज्य के अनियंत्रित सत्ता में विश्वास। 
  • संप्रभुता के विकेंद्रीकरण में विश्वास। 
  • बहुलवाद राज्य के अस्तित्व का विरोधी नहीं है। 
  • राज्य का कार्य विभिन्न समूह की गतिविधियों को नियंत्रित करना एवं उनमें सामंजस्य स्थापित करना। 
  • व्यवसायिक प्रतिनिधित्व में विश्वास। 
  • कानून राज्य से ऊपर है संप्रभुता का आदेश ही कानून नहीं।
  •  अन्य समुदायों को भी विधि (कानून) निर्माण की स्वतंत्रता ।

 बहुलवादी द्वारा राज्य के संप्रभुता सिद्धांत की आलोचना अथवा उस पर लगाए गए प्रश्न-चिन्ह 

  1.  समाज की स्थिति के आधार पर 
  2. ऐतिहासिक दृष्टिकोण के आधार पर 
  3. व्यक्ति के विकास के आधार पर 
  4. लोकतंत्र के आधार पर 
  5. कानून के स्वरूप के आधार पर 

 1.  समाज की स्थिति के आधार पर 

बहुलवादी कहते हैं कि समाज की जो वर्तमान स्थिति है, जो एक व्यक्ति वह राजनीतिक प्राणी नहीं है बल्कि वे सामाजिक प्राणी है, आर्थिक, धार्मिक प्राणी है |यदि उसके राज्य में एक व्यक्ति कई समुदायों का सदस्य होता है| राज्य केवल व्यक्ति के समस्त जरूरतों को अकेले ही नहीं पूरा कर सकता है| व्यक्ति को अन्य संगठन की आवश्यकता पड़ती ही है इसलिए क्योंकि व्यक्ति की जरूरतें बहुत है और राज्य अकेले उन जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता है| “समाज का स्वरूप संघात्मक है इसलिए सत्ता भी संघात्मक होनी चाहिए | यह लास्की का कथन है|” 

2. ऐतिहासिक दृष्टिकोण के आधार पर 

इतिहास उठाकर देखने पर भी हमें या पता नहीं चलता है कि जैसा की बहुलवादी कहते हैं कि संप्रभुता निरंकुश होती है, संप्रभुता सर्वोच्च होती है, संप्रभु निरंकुश हो ही नहीं सकती| उस पर कुछ ना कुछ प्रतिबंध होगा ही चाहे जनता का दबाव होगा ईश्वर का दबाव होगा| किसी ना किसी का दबाव उसके ऊपर होगा ही इसलिए संप्रभुता एक ही जगह केंद्रित नहीं होनी चाहिए बल्कि संप्रभुता का विभाजन होना चाहिए| 

 3. व्यक्ति के विकास के आधार पर 

 व्यक्ति ने राज्य का निर्माण किया है| राज्य व्यक्ति का एक संगठन हैं | व्यक्तियों ने मिलकर राज्य को अपने विकास के लिए बनाया हैं इसलिए व्यक्ति राज्य के अधीनता में रहना वह स्वीकार कर रहा है और व्यक्ति के विकास के लिए जरूरी है कि उसको कुछ अधिकार मिले तब ही वह अपना विकास कर पाएगा| लेकिन संप्रभुता की जो प्राचीन धारणा है कि संप्रभुता निरंकुश हैं, संप्रभुता केवल एक जगह रहेगी |यदि उसको स्वीकार कर लिया जाए तो व्यक्ति का विकास रुक जायगा सभी ओर अराजकता फैल जाएगी इसलिए संप्रभुता पर अंकुश लगाना जरूरी है और संप्रभुता पर प्रतिबंध रहेगा तो संप्रभुता नियंत्रित रहेगी और व्यक्ति का विकास होगा उसके अधिकारों को कोई छिनने वाला नहीं होगा, ऐसा बहुलवादियों का कहना है | 

 4. लोकतंत्र के आधार पर 

 संप्रभुता का विभाजन लोकतंत्र का आधार है वह कहते हैं कि लोकतंत्र जनता का शासन होता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में केंद्रीयकरण को नहीं विकेंद्रीकरण को अपनाया जाता है| जैसे:- भारत में जनता का बंटवारा है और यहां पर  तीन प्रकार  कि सरकार शासन व्यवस्था चलाती है| संघ, राज्य सरकार, स्थानीय | आज गांव कि जो समस्याएं है और समस्याओं को जो निदान किया है वह गांव के लोग मिलकर एक सरपंच को ढूंढते हैं, जिसको हम गाँव का प्रधान कहते हैं | जो प्रधान है, वह गांव का छोटा व्यक्ति है, जो गांव का रहने वाला है जो कि कहीं ना कहीं राजनीतिक में भाग ले रहा है| सत्ता में अधिकतर लोगों की भागीदारी हो रही है और यह सत्ता के विकेंद्रीकरण के कारण संभव हो पाया इसलिए सत्ता का बंटवारा होना चाहिए |

5. कानून के स्वरूप के आधार पर 

 इनका कहना है कि संप्रभुता का जो प्राचीन सिद्धांत (एकलवादी संप्रभुता) है संप्रभुता की आज्ञा ही कानून | ये गलत है जो हमारे बहुत से रीति-रिवाज जो आगे चलकर कानून का रूप ले लेती है| कानून संप्रभुता का आदेश नहीं बहुलदियों का कहना है| 

 क्रैब- “यह राज्य नहीं जो विधि का सृजन करता है| वरन् यह            विधि है, जो राज्य का सृजन करती हैं|” 


 मैकाइवर- “राज्य कानून की संतान और जनक दोनों हैं|”


  • कानून किसी निश्चित इच्छा की अभिव्यक्ति नहीं है राज्य रीति रिवाज का रक्षक है व कानूनों की घोषणा करता है सृजन नहीं।

  • “कानून की विशाल पुस्तक में राज्य केवल कुछ नए वाक्य जोड़ देता है और पुराने वाक्य को इधर-उधर कर देता है, पुस्तक का अधिकांश भाग राज्य द्वारा कभी नहीं लिखा जाता है।“ 


लिंडसे- “प्रभुसत्ता संपन्न राज्य का सिद्धांतधराशायी हो गया                 है|” 


क्रैब- “प्रभुसत्ता की धारणा को राज्य सिद्धांत                        निकाल देना चाहिए|” 


बार्कर- “प्रभुसत्ता संपन्न राज्य की मान्यता निर्जीव व निरर्थक हो चुकी है|” 


लास्की- “प्रभुसत्ता को सिद्धांत राजनीतिक दर्शन के लिए                     वैद्य नहीं है|” 


लास्की- “संप्रभुता मूलत: संकट का सिद्धांत है|” 


लास्की- “राजनीति शास्त्र के लिए यह स्थाई रूप से                             लाभदायक होगा यदि प्रभुसत्ता के सिद्धांतों                           को इससे निकाल दिया जाए |” 


फिजिस- “प्रभुसत्ता का विचार एक पूर्ण अंधविश्वास                             के समाज है और यह राजाओं के दैवीय अधिकारों                 के समान समाप्त हो जाएगा|” 


 बहुलवाद की आलोचना 

  •  संप्रभुता का विभाजन उचित नहीं| 
  • व्यक्तियों की स्वतंत्रता के लिए घातक है। 
  •  राज्य की एकता-अखंडता को खतरा। 
  •  बहुलवादी मान्यताओं में अंतर्विरोध| 
  • समाज की बेहतरी के लिए विभिन्न समुदायों पर समाज का नियंत्रण आवश्यक। 
  •  सभी समुदाय समान स्तर के नहीं हो सकते।

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